Saturday, March 12, 2011

जिंदगी

सागर की गहराइयो से लेकर आसमान की उचाइयो में
ढूंडा उसे जिसे मैं जानता तक नहीं,
परछाइयों से लेकर शुरुमुयी शाम तथा पहाडो से
पूछा उसे जिसे मैं जानता तक नहीं
 
आज रात पूनम की, और चाँद हँसता है
पूंछता है मुझसे कहाँ खोये हो?
ठंडी हवाए सहलाते हुए गालों को
पूंछती है मुझसे कितना रोये हो?
 
मै हूँ की चुपचाप बेपरवाह
अपनी ही रौ में बहते हुए,
जिंदगी जीने की मजबूरी लिए
जिंदगी ही ढूंढता फिर रहा हूँ.

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