Saturday, May 28, 2011

राजनीति

छोटा  बोला विज्ञान छोड़ मै राजनीत में जाउंगा.
कुछ ही दिन में मै ए राजा और कलमाड़ी बन जाऊँगा.
देश धर्म, संस्कृति विरासत, इनको दूर भागाउंगा.
जयललिता या कनिमोझी, जैसी को घर में लाऊंगा.

साइंस और टेक्नोलोजी, की सब बाते बेमानी है.
डाक्टर, वैज्ञानिक, साहित्यकार इनकी तो दिखती नानी है
दिन रात एक्विसन साल्व करे, क्या लाभ और क्या हानि है
सुश्री बहन जी के आगे आखिर  सब भरते पानी है.

भैया मेरा अब एडमीशन राजनीत शाश्त्र में करवाओ
अपना मेरा और भाभी का लाकर नोटों से भरवाओ
गर मिली मुझे अच्छी बीवी खुद लाकर भर कर लायेगी.
भाग्य अगर फूटे होंगे, वापस मैके को जायेगी.

तो हुआ फैसला अब आगे साइंस नहीं पढ़ना मुझको
आइन्स्टीन राबर्ट हूक, सुश्रुत नहीं बनना मुझको.
भौतिकी रसायन जीव वनस्पति मैथ नहीं पढ़ना मुझको
राजनीति शाश्त्र अब पढ़ करके है बस नेता बनना मुझको.




Sunday, March 20, 2011

होली

होली के हुडदंग में, भूल के सब कुछ यार.
गुझिया, रंग, गुलाल औ यारां की भरमार.

सोनू मोनू, संटी बंटी है सब रंग में डूबे.
भिगो रहा है कोई किसी को भगा कोई बिन जूते.

फिकर नहीं है किसी बात की यार यही है होली.
रोज नहीं क्यों बन पाती है हम यारो की टोली.

रंग हमें है यही बताते, लाल हरे नीले और पीले.
जीवन को रंगीन बनाओ, मिटा द्वेष चिंता की कीलें.

आओ सब मिल करे प्रतिज्ञा दिल न किसी का तोड़ेंगे.
मर्यादा बंधन के अन्दर इक दूजे को जोड़ेंगे.

Saturday, March 12, 2011

जिंदगी

सागर की गहराइयो से लेकर आसमान की उचाइयो में
ढूंडा उसे जिसे मैं जानता तक नहीं,
परछाइयों से लेकर शुरुमुयी शाम तथा पहाडो से
पूछा उसे जिसे मैं जानता तक नहीं
 
आज रात पूनम की, और चाँद हँसता है
पूंछता है मुझसे कहाँ खोये हो?
ठंडी हवाए सहलाते हुए गालों को
पूंछती है मुझसे कितना रोये हो?
 
मै हूँ की चुपचाप बेपरवाह
अपनी ही रौ में बहते हुए,
जिंदगी जीने की मजबूरी लिए
जिंदगी ही ढूंढता फिर रहा हूँ.